भारत में सुधारवादी भाषा में अक्सर यह लिखा-बोला जाता है कि व्यवस्था परिवर्तन करना है.वर्तमान व्यवस्था में दोष हैं और उसे बदलकर ही देश को, समाज को मजबूत किया जा सकता है.
मैं पूछता हूँ कि भारत की व्यवस्था है कहाँ, जिसे बदला जाना है. यह व्यवस्था तो अंग्रेज की थी, उसके राज को कायम रखने के लिए. शासन की, शिक्षा की, खेती-उद्योग की वर्तमान व्यवस्था तो अंग्रेजी हितों के अनुसार प्लान की गई थी. इस व्यवस्था में शब्दों का हेरफेर करने से क्या हासिल हुआ है और क्या होगा ? बल्कि नुकसान जरूर हुआ है और होगा. अब President को राष्ट्रपति (राष्ट्र को पालने वाला) या Governor को राज्यपाल(राज्य को पालने वाला) कहोगे तो क्या परिवर्तन होगा ? उल्टे अर्थ का भद्दा अनर्थ होगा. उस पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री जैसे राजतन्त्र के शब्दों को थोपकर जनता को अपने शासन(लोकतंत्र) का अहसास कैसे दिलवाया जा सकता है ?
हमें इस व्यवस्था में सुधार करने की भूल नहीं करनी है, जैसा असफल प्रयास अभी तक कुछ लोग करते आये हैं. हमें तो भारत की अपनी व्यवस्था बनानी है. एकदम नई. भारत के हितों की पूर्ति करते हुए, भारत की संस्कृति और प्रकृति के अनुकूल.
और हमने ‘अभिनव राजस्थान’ में ऐसा कर लिया है. नई व्यवस्था तैयार कर ली है. हमारी वेबसाइट abhinavrajasthan.org पर जाकर अलग अलग सात विषयों में देखिये. जयपुर से गाँव तक का नया शासकीय ढांचा और उसकी कार्ययोजना बना ली गई है. जैसे ही मौका मिलेगा, यह व्यवस्था राजस्थान में और फिर भारत में लागू करने का ईरादा है. वर्तमान शासनों के माध्यम से या वैकल्पिक माध्यम से. करना तो पड़ेगा अगर, भारत को एक देश के रूप में, एक राष्ट्र के रूप में, एक समाज के रूप में, एक संस्कृति के रूप में बचाना है.
लेकिन इसके लिए व्यापक जनजागरण की आवश्यकता है. यह पहली जरूरत है. ‘अभिनव राजस्थान अभियान’ में हम यही कर रहे हैं. इसके बिना नई व्यवस्था कारगर साबित नहीं होगी, जैसा कि 1947 में हुआ है. एक देश को तथाकथित रूप से स्वतंत्र करके ऐसे हाथों में सौंप दिया गया जो राष्ट्रहित को संरक्षित करने के लिए प्रशिक्षित नहीं थे. हम आज उसी आधे अधूरे परिवर्तन को भुगत रहे. अधकचरा देश और समाज बनकर रह गए हैं.
‘अभिनव राजस्थान’ से ‘अभिनव भारत’ की यात्रा जारी है.
हौसले के दम पर, आप मित्रों के दम पर.
वंदे मातरम !